Thursday, October 29, 2020

जिंदगी हौसलों से भरी हो तो कोई कमजोरी इंसान को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती

 


ये कहानी है कि अमेरिका की प्रसिद्ध धाविका विल्मा रूडोल्फ की। विल्मा रूडोल्फ की कहानी आपको सिखाएगी कि जिंदगी हौसलों से भरी हो तो कोई कमजोरी इंसान को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती। अगर लक्ष्य को हासिल करने की जिद्द हो तो कोई बाधा आपकी सफलता का दरवाजा बंद नहीं कर सकती। विल्मा का जन्म अमेरिका के एक गरीब परिवार में हुआ था। वह एक अश्वेत परिवार में जन्मी थी। विल्मा को चार साल की उम्र में पोलिया हो गया था। डॉक्टर तक जवाब दे चुके हैं, अब यह बच्ची नहीं चलेगी। 

विल्मा हार चुकी थी। उसे समझ में नहीं आता था, लेकिन एक दिन मां ने विल्मा को थामे हुए बहुत प्यार से समझाया, ‘सब ठीक हो जाएगा, तू चिंता मत कर, तू जरूर उठेगी और चलेगी’। विल्मा को सहसा विश्वास नहीं हुआ, मां यूं ही बोल रही होंगी। मेरे उदास मन को बहला रही हैं, डॉक्टरों ने हाथ खडे़ कर दिए हैं, लेकिन मां कह रही हैं, तू उठेगी और चलेगी। फिर भी मां का यह बोलना दिल को ऐसे सुकून दे गया, मानो डूबते को तिनका। ऐसे बच्चों को मां-बाप भी छोड़ ही देते हैं, पर मां ने उस जरूरी चाह को लौटाया, जो पोलियो ने छीन लिया था। 

मां ने डॉक्टरों का पीछा नहीं छोड़ा। डॉक्टरों से बात करते यह विश्वास धीरे-धीरे गाढ़ा होता गया कि मालिश से इलाज मुमकिन है। दो साल तक मां अपनी विल्मा को गोद में लिए बहुत दूर अस्पताल का सफर तय करती रहीं। डॉक्टरों को उम्मीद नहीं थी, लेकिन मां ने विल्मा के मन में जो उम्मीदों का बाग लगाया था, उसमें फूल खिलते रहते थे। मन में मां गूंजती रहती थीं- एक दिन तू जरूर चलेगी।

कभी लगता, काश! मां पहले ध्यान देतीं, लेकिन वह तो लोगों के घरों में काम करने में उलझी रहती थीं और विल्मा अपनी सिलसिलेवार बीमारियों में। पहले मां के पास कहां समय था, घर में 22 बच्चे थे, पिता की दो शादियों से। इतने बडे़ परिवार में बच्ची ने सबका ध्यान तभी खींचा, जब डॉक्टरों ने बता दिया कि अब इस बच्ची को बस ढोते रहना है। बच्ची की बाहर मालिश कराते-कराते मां भी मालिश सीख गईं और घर की बड़ी बेटियों को भी मालिश करना सिखा दिया। मां ने सबको बता दिया कि देखो, विल्मा के पैर को फिर जिंदा करना है। दायां तो ठीक है, बायां ही चुनौती दे रहा है, जिसका सामना हमें मिलकर करना है। जब मौका मिले, इस कमजोर पैर की मालिश से पीछे नहीं हटना। घर की पूरी मातृ शक्ति ने बीड़ा उठा लिया। मां तो लगी ही रहतीं और जब जिस बड़ी बहन को मौका मिलता, वही मालिश में जुट जाती।  

कुछ ही दिनों में विल्मा बाएं पैर पर कुछ जोर देने लगी। मां, बहनों की उम्मीद और बढ़ गई। वे अक्सर विल्मा के लेग ब्रेस हटा देती थीं और पैर की मालिश शुरू कर देती थीं। आठ साल की उम्र में विल्मा ने बिस्तर छोड़ लेग बे्रस पहने चलना शुरू कर दिया। एक दिन वह भी आया, जब मां ने विल्मा को बास्केटबॉल खेलते देखा। विल्मा की उम्र थी 11 साल। वह न सिर्फ दौड़ती थीं, उछलकर बॉल को बास्केट में भी डालने लगी थीं। जल्दी ही ब्रेस से मुक्ति मिल गई और जब भी मौका मिलता, वह दौड़ लगा देतीं। लगातार तेज से और तेज। विल्मा रूडोल्फ (1940-1994) जानी-मानी खिलाड़ी और धावक बन गईं। 

सोलह की उम्र में अपने देश की ओर से मेलबर्न ओलंपिक खेलों के लिए चुनी गईं। 100 गुणा चार रिले रेस में कांस्य पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा रहीं। उसके चार साल बाद वह रोम ओलंपिक में रिकॉर्ड तोड़ते हुए तीन-तीन स्वर्ण जीतने में कामयाब रहीं। जिस लड़की को कभी डॉक्टरों ने हमेशा के लिए अपंग मान लिया था, उस लड़की ने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धावकों में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में हमेशा के लिए लिखवा लिया। उन्हें दुनिया की सबसे तेज महिला कहा गया। शोहरत की बुलंदियों पर भी वह पुराने दिनों को याद करते हुए कहती थीं, ‘मेरे डॉक्टरों ने मुझे बताया था कि मैं फिर कभी नहीं चलूंगी। मेरी मां ने मुझे कहा कि मैं चलूंगी। मैंने अपनी मां पर विश्वास किया’। कुदरत का करिश्मा देखिए, मां के निधन के कुछ दिनों बाद विल्मा को गंभीर बीमारी हुई और उन्होंने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। मां और बेटी, शायद एक-दूजे के लिए जन्मी थीं। 

सोशल मीडिया से

Monday, July 8, 2019

13 साल की उम्र में कट गए दोनों हाथ,फिर भी नहीं छोड़ा हौसला और लिख डाली जीत की कहानी



‘दिव्यांगता शरीर से होती है, मन से नहीं। अगर आप मन से कुछ करने की ठान ले तो कुछ भी असंभव नहीं होता है।’ यह कहना है बाबतपुर, बनारस की रानी वर्मा का। एकेटीयू के सेंटर फॉर एडवांस स्टडीज (कैस) में हाल ही में ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट असिस्टेंट के पद पर तैनात हुईं रानी के 13 साल की उम्र में एक हादसे में दोनों हाथ कट गए। रानी ने हार मानने की जगह पैर से लिखना सीखा। हाईस्कूल व इंटर के बाद बीटेक किया और गेट भी क्वालीफाई कर लिया। वह अपनी छोटी बहन को बीएड, दूसरी बहन को बीटेक और भाई को बीएससी की पढ़ाई में सहयोग कर रही हैं। रानी पूरे परिवार का खर्च भी उठा रही हैं।
 मां ने पढ़ाई शुरू कराई ...और चल पड़ी जिंदगी
रानी ने बताया कि वर्ष 2000 में जब वह छठीं क्लास में थीं तो गांव में एक पानी के पंपिंग सेट पर गई थी। जहां वह गलती से पंप के पट्टे पर गिर पड़ी। इस हादसे में उनके दोनों हाथ कट गए। एक बार तो लगा कि पूरी जिंदगी अब बड़ी मुश्किल में कटेगी। किंतु मां सूर्यपति देवी सहारा बनीं। मां टीचर थीं। वह न सिर्फ दैनिक कार्यों में सहयोग करती थीं, बल्कि पूरा संबल देकर पढ़ाई शुरू कराई। मां पढ़ाई में सहयोग करती थी और मैंने भी पैर से लिखना शुरू किया। इसके बाद एक बार फिर जिंदगी चल पड़ी। मैंने हाईस्कूल और इंटर प्रथम श्रेणी में पास किया।
भाई-बहनों को पढ़ाने के साथ उठा रहीं घर का खर्च
पिता की आर्थिक स्थिति ठीक न होने से रानी ने न सिर्फ नौकरी शुरू की बल्कि छोटी बहन रंजना को भी बीएड की तैयारी करवा रही हैं। सबसे छोटी बहन अर्चना भी आईटीएस ग्रेटर नोएडा से बीटेक कर रही है। छोटा भाई बीएससी एग्रीकल्चर की बनारस से ही पढ़ाई कर रहा है। रानी ने बताया कि पिता के पास खेत न होने से दिक्कत आती है। रानी ने पहले आईकोल व उसके बाद पीएसयू में काम किया। वह दिल्ली स्थित एक कोचिंग की ब्रांड एंबेसडर भी बनीं। हाल में दीनदयाल उपाध्याय क्वालिटी इंप्रूवमेंट प्रोग्राम के तहत कैश में ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट असिस्टेंट की भर्ती का आवेदन किया। अब यहां कैश में काम कर रही हैं।
मां की मौत के बाद फिर आई कठिन घड़ियां
एक बार फिर भगवान ने मेरी परीक्षा ली। मां की बीमारी से मौत हो गई। मैं फिर अंदर से टूटने लगी। इस बार बड़ी बहन रेखा मेरी सहारा बनी। उसके सहयोग से मैंने पढ़ाई शुरू की। मां के दिए हौसले व किसान पिता रमेश चंद्र के सहयोग से मैंने आरकेजीआईटी गाजियाबाद से बीटेक किया। गेट भी क्वालीफाई किया। इस दौरान मैंने कंप्यूटर व लैपटॉप पर काम करना सीखा।
कभी सहयोग तो कभी सरकार से मिली निराशा
रानी सरकारी सिस्टम से थोड़ा परेशान हैं लेकिन बताती हैं कि सहयोग भी उसी का मिला है। जब 10वीं प्रथम श्रेणी में पास किया तो प्रधानमंत्री की एक योजना के तहत उन्हें एक लाख रुपये मिले थे। इस आर्थिक सहयोग ने आगे बढ़ने का हौसला दिया। किंतु इतना क्वालिफाई होने के बाद भी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर सकती, क्योंकि उसमें दोनों हाथ से दिव्यांग के लिए कोई कॉलम नहीं है। हमारे पास गांव में कच्चा घर है, आज तक कोई आवासीय सहायता नहीं मिली। आश्वासन दिया गया कि पिता को पट्टा मिलेगा, इस पर भी कार्रवाई नहीं हुई।

Saturday, June 29, 2019

..क्योंकि एक खिलाड़ी कभी हार नहीं मानता


वह देश के लिए मेडल जीतने का ख्वाब देखने वाला एक जिमनास्ट था। बिजली की चपलता से जब कलाबाजियां खाता तो देखने वाले कह उठते कि एक दिन उसका सपना जरूर सच होगा। जीतोड़ प्रेक्टिस के दौरान 30 मई 2009 को ऐसी बीमारी हुई, जिसने मंजिल की ओर बढ़ते उसके पांव बेकार कर दिए। ऑपरेशन के चार साल बाद वह व्हीलचेयर पर बैठा तो उसके सपने भी बिस्तर से उठ खड़े हुए। उसने इंटरनेट पर पैरागेम्स के बारे में जानकारी ली। फिर व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे पैरा एथलीट के तौर पर यूपी को कई मेडल दिला दिए। अब देश के लिए मेडल लाने वह दुबई जाने वाला है।
किसी फिल्मी स्टोरी की तरह लगने वाली यह कहानी बलरामपुर सिविल लाइंस में रहने वाले हर्षवर्धन (20) की है। इन दिनों वह नवंबर में दुबई में होने जा रहे पैरा ओलंपिक की तैयारियों में जीजान से जुटे हैं। वह वहां देश की ओर से व्हीलचेयर मैराथन में प्रतिभाग करेंगे। गृहिणी मां सीता और प्राइवेट नौकरी करने वाले पिता हिमांशु दीक्षित उन्हें उत्साहित करते रहते हैं। बीमारी के बीच करीब आठ साल पहले शुरू हुए शगल ‘मॉडर्न हार्ड रॉक सिंगिंग’ से वह प्रेक्टिस के दौरान तबीयत हल्की करते रहते हैं। वह नियमित रूप से यू-ट्यूब चैनल ‘एससीआइ स्पाइन केयर इंडिया’ पर ट्रेनर के रूप में स्पाइनल कार्ड इंजरी से पीड़ित लोगों में हौसला भी भरते हैं। वह बरेली में फुटबॉल का प्रशिक्षण ले रहे अपने छोटे भाई यशवर्धन (16) के लिए प्रेरणाश्रोत हैं। यशवर्धन को भी अपने बड़े भाई पर गर्व है।
पैरा एथलीट के रूप में अब तक ये हैं उपलब्धियां
जालंधर में आयोजित पांच किलोमीटर व्हीलचेयर मैराथन व क्लब थ्रो गेम्स में प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रजत पदक हासिल किया। इससे पहले चतुर्थ उप्र पैरा एथेलेटिक्स चैंपियनशिप के डिस्कस थ्रो में दूसरा स्थान हासिल किया। इसके साथ अब तक यूपी के लिए 11 पदक हासिल किए हैं।
  • जिमनास्ट को दिव्यांगता ने जकड़ा तो पैरा एथलीट बनकर जीते मेडल
  • बलरामपुर के हर्षवर्धन का चयन पैरा ओलंपिक के लिए भारतीय टीम मे


Friday, June 28, 2019

काशी का अनोखा रेस्टोरेंट यहां स्वागत से लेकर मेजबानी तक करते हैं, दिव्यांग


सोचिए आप किसी रेस्टोरेंट में जाएं और वहां दरवाजे पर आपका स्वागत कोई दिव्यांग व्हील चेयर पर बैठकर मुस्कुराते हुए करे। जी हां, वाराणसी में एक ऐसा ही रेस्टोरेंट है कैफेबिलिटी जहां पर गेट पर स्वागत से लेकर रेस्टारेंट की रसोई, वेटर सभी दिव्यांग लड़के लड़कियां है। कैफेबिलिटी की दो शाखाएं हैं एक मलदहिया स्थित विनायक प्लाजा में दूसरा आईपी मॉल सिगरा में। दोनों की जगहों पर करीब 15 दिव्यांग लड़के लड़कियां काम करते हैं और खुद को स्वावलंबी बना रहे हैं। 
करीब दो वर्ष पहले तीन दोस्तों ने कैफेबिलिटी के जरिए दिव्यांगों को बेचारगी से निकालने का जिम्मा उठाया। ये थे बिंस जॉन, सूरज मेथ्यू और साजी जोसेफ। विनायक प्लाजा में कैफेबिलिटी के डायरेक्टर सीजा जोसेफ ने बताया कि लगभग 20 साल पहले हम तीनों बनारस आए। मैं चेन्नई में एक यूनिवर्सिटी में पढ़ाता था। सूरज आंध्रप्रदेश से हैं और बिंस मेरे ही शहर से। हम तीनों की बनारस में मुलाकात हुई। वक्त बीता एक ही सोच तीनों में थी कि दिव्यांग लोगों के लिए कुछ करना है। इसी बात को लेकर जनविकास समिति और किरण संस्था से जुड़ गए। सीजा ने बताया दोनों ही संस्थाओं में दिव्यांगों के लिए कार्य होता है। हमने दिव्यांग लड़के लड़कियों को कोई अपने यहां काम पर नहीं रखता था। ऐसे में फिर तय हुआ बनारस टूरिज्म का हब है तो यहां पर रेस्टोरेंट या होटल इंडस्ट्री में इनके जॉब की व्यवस्था शुरू की जाए। इसके बाद इस रेस्टोरेंट को हम तीनों ने खोला। यहां दिव्यांग बच्चों को छह महीने की ट्रेनिंग दी गई। जिसमें डिशेज बनाने से लेकर, सर्व करना, कॉफी, बेवरेज बनाना सभी चीजें सिखाई गईं। यहां के ट्रेंड बच्चे तो आज साउथ और रांची के कई रेस्टोरेंट में भी काम कर रहे हैं। विशेष बात यह कि इन सभी बच्चों को कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया सहित कई बड़ी प्रोफेशनल कंपनियों द्वारा ट्रेनिंग दी गई है। हमारे यहां ऐसी भी लड़कियां हैं जो एमबीए कर रही हैं। सभी बहुत खुश हैं आए दिन हमारे किचन की रसोई में नए नए प्रयोग होते हैं। सभी दिव्यांग सामान्य परिवार से हैं।
लहरतारा के रहने वाले भीमराज जो कि पैरों से दिव्यांग हैं उन्हें ये पसंद नहीं कि कोई उनको सहारा दे। भीमराज का कहना है मैं सक्षम हूं खुद से सबकुछ करने के लिए। बताया लहरतारा से स्वयं ट्राई साइकिल चलाकर रेस्टारेंट आता हूं। हदूर से आती गाड़ी की स्पीड के अनुसार मैं अंदाजा लगा लेता हूं कि वह मेरे करीब कब तक पहुंच जाएगी इसी आधार पर रास्ता पार कर लेता हूं। जब स्कूल में था तो टीचर की लिप्सिंग से दूर से ही यह समझ लेता था कि वह क्या पढ़ा रहे हैं। मगर पैर के आपरेशन के बाद और न्यूरो की परेशानी से इस वक्त परेशान हैं। मगर रेस्टारेंट में काम करके खुद को मजबूत सा महसूस करते हैं। भीमराज के पिता रामलखन शास्त्री सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त हैं। भीम ने बताया कि मेरा पूरा परिवार हर पल मेरा सहयोग करता है।
चांदमारी की रहने वाली रेस्टारेंट की असिस्टेंट मैनेजर रितु पटेल जो एक पैर और एक हाथ से दिव्यांग हैं उन्होंने बताया मुझे कभी नहीं लगा की हम सामान्य नहीं है बल्कि सामान्य इंसान से ज्यादा और बेहतर काम करते हैं। मैं एमबीए कर रही हूं और होटल इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाना चाहती हूं। 
सिगरा की रहने वाली शालिनी जो कि पैरों से दिव्यांग हैं उन्होंने बताया पहले लगता था कि जीवन बेकार है। मगर जब से यहां जुड़ी जिंदगी अच्छी लगती है। हम बेचारे नहीं खास हैं। 
कस्टमर करते हैं इन पर गर्व
रेस्टोरेंट में आने वाले कस्टमर इन दिव्यांगों को देखकर बड़ा गर्व महसूस करते हैं। क्योंकि ये लोग बेचारे नहीं बादशाह बनकर जीवन जीते हैं। प्रिया यादव व जाहृनवी ने बताया कि इन दिव्यागों को देखकर ये अच्छा लगा कि ये लोग दूसरों पर निर्भर नहीं बल्कि खुद के बल पर जीते हैं और खुश हैं।


साभार  

दिव्यांग नए कानून में अब बनवा सकेंगे ड्राइविंग लाइसेंस, ड्राइविंग की सहूलियत से करवा सकेंगे वाहन में जरूरी परिवर्तन



Monday, June 24, 2019

प्रयागराज : दिव्यांगों की अनदेखी पर खत्म होगी संबद्धता


प्रदेश के डिग्री कालेजों को दिव्यांगों की अनदेखी भारी पड़ेगी। दिव्यांगजनों की सहूलियत के अनुरूप सुविधा मुहैया न कराने वाले डिग्री कालेजों पर उच्च शिक्षा निदेशालय की पैनी नजर है। ऐसे कालेजों की रिपोर्ट तैयार करके शासन को भेजी जाएगी। साथ ही उनकी संबद्धता खत्म करने के लिए संबंधित राज्य विश्वविद्यालयों को निर्देशित किया जाएगा। विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया है कि उन्हीं नए डिग्री कालेजों को मान्यता दी जाए, जिनके भवन दिव्यांगों की सुविधा के अनुरूप बने हैं।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत शैक्षिक संस्थानों में दिव्यांगों को बेहतर सुविधा मुहैया कराने की कार्रवाई शुरू हो गई है। इसके तहत प्रदेश के समस्त राज्य विश्वविद्यालयों व डिग्री कालेजों में दिव्यांगों की सुविधा के अनुरूप शौचालय, मूत्रलय व रैंप बनाने का निर्देश दिया गया है। समस्त डिग्री कालेजों को अपने राज्य विश्वविद्यालयों के जरिए हर माह की दस तारीख के अंदर रिपोर्ट उच्च शिक्षा निदेशालय को भेजनी है। शासन ने निदेशालय में उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा समूह क सेवा के अधिकारी डॉ. इंदू प्रकाश सिंह को उसका नोडल बनाया है।
  • उच्च शिक्षा निदेशालय ने राज्य विश्वविद्यालयों से मांगी रिपोर्ट
  • दिव्यांगजनों को सुविधा मुहैया कराने पर ही नए कॉलेज को मान्यता


Friday, June 21, 2019

वाराणसी: दिव्यांग जरूर हूं, लेकिन किसी पर बोझ नहीं बनूंगी


जख्म दिल पर लगे या जिस्म पर, अक्सर हौसले डगमगा जाते हैं। मगर विरले ही हैं जो लाख दुश्वारियों के बाद भी लक्ष्य को साधने का हौसला रखते हैं। कुछ ऐसा ही जज्बा दिखाया है जौनपुर की अंजूलता सिंह ने।
दृश्य कला संकाय, बीएचयू के बीएफए अंतिम वर्ष की छात्र अंजूलता सिंह व सहपाठी राकेश कुमार परिसर में ही शनिवार को दुर्घटना के शिकार हो गए थे। दोनों का इलाज ट्रामा सेंटर में चल रहा है। दैनिक जागरण से बातचीत करते हुए अंजू की आंखें छलक उठीं। कहा, भले ही मैं दिव्यांग हूं, लेकिन कभी किसी से मदद नहीं ली। पढ़ाई मुकम्मल करने के बाद नौकरी करना चाहती हूं। पारिवारिक स्थिति बेहतर है, बावजूद इसके समाज में खुद का मुकाम बनाने की तमन्ना है, ताकि मैं किसी पर बोझ न बनूं। मूलरूप से खुटहन नकवी-जौनपुर की रहने वाली अंजू के पिता कैलाश नाथ सिंह को-ऑपरेटिव बैंक के सचिव हैं। अंजू ने हाल ही में बीएचयू से एमएफए-टेक्सटाइल की प्रवेश परीक्षा दी है। इसके अलावा जेजे कालेज ऑफ आर्ट व विश्वभारती का भी फार्म भरा था, जिसकी प्रवेश परीक्षाएं अभी बाकी हैं। बड़े भाई राजेश कुमार के मुताबिक तीन भाइयों में अंजू सबसे छोटी है। जन्म से ही उसका दाहिना पैर कमजोर था, लेकिन हौसला नहीं।
तय किया है राष्ट्रीय पुरस्कार तक का सफर: अंजू शुरू से पढ़ाई में बेहतर रही हैं। विभिन्न कक्षाओं में साइंस प्रोजेक्ट के लिए कई अवार्ड भी मिल चुके हैं। स्कूल स्तर पर कोई भी स्पर्धा हो, उसमें प्रतिभाग जरूर करती थी। स्थानीय स्तर से लेकर उसने इंस्पायर अवार्ड के राष्ट्रीय पुरस्कार तक का सफर तय किया। हालांकि मामूली अंतर से वह खिताब से चूक गई थी, लेकिन जज्बा अब भी कायम है।

Monday, May 20, 2019

भारत में विकसित हुई तकनीक: दिव्यांगों और बुजुर्गों के बुलाने पर दौड़ी आएगी 'स्मार्ट' व्हीलचेयर



अभी तक आपने चेहरे के हाव-भाव और आंखों की दिशा में चलने वाली व्हीलचेयर के बारे में सुना होगा, ये दोनों ही तकनीक अमेरिका में ईजाद कर ली गई हैं। हालांकि अभी तक इनके सिर्फ प्रोटोटाइप ही तैयार किए गए हैं। लेकिन भारत में अब एक ऐसी स्मार्ट व्हीलचेयर विकसित की गई है, जो एक आवाज पर चल कर आ जाएगी। कानपुर के एलनहाउस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के छात्रों ने पहली बार ऐसी 'स्मार्ट' व्हील चेयर बनाई है, जो पूरी तरह आवाज से कंट्रोल होगी। 

इंटरनेट ऑफ थिंग्स की मदद से तैयार की
रूमा स्थित इंस्टीट्यूट के छात्रों ने 'इंटरनेट ऑफ थिंग्स' की मदद से इसे तैयार किया है। इसकी खासियत है कि कोई भी बोलकर इसे आगे-पीछे और दाएं-बाएं कर सकता है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (यूपीसीएसटी) की ओर से आयोजित प्रतियोगिता में इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियङ्क्षरग (सभी चौथे वर्ष) के छात्रों नवल कुमार (ग्रुप लीडर), उदय कुमार और शिवदास यादव ने इसे प्रदर्शित किया था। छात्रों का दावा है कि इस तरह की व्हीलचेयर बाजार में उपलब्ध नहीं है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इसे जल्द ही बाजार में उतारा जाएगा। इसे बेहतर तरीके से तैयार करने के लिए सरकार ने 10 हजार रुपये का अनुदान दिया है।
ऐसे काम करेगी व्हीलचेयर
इस तकनीक को ईजाद करने में छात्रों का मार्गदर्शन करने वाले संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.राहुल उमराव ने बताया कि 'इंटरनेट ऑफ थिंग्स' के तहत हम इंटरनेट से किसी भी डिवाइस को कंट्रोल कर सकते हैं। छात्रों ने व्हीलचेयर में ऑर्डिनो (एयूआरडीआइएनओ) डिवाइस लगाई है। इसे एक स्मार्टफोन से अटैच किया गया है। इसके लिए एक एप भी तैयार की गई है। एप को ओपन कर जैसे ही लेफ्ट, राइट, फॉरवर्ड और बैक बोलेंगे वैसे ही व्हीलचेयर मूवमेंट करने लगेगी।
60 दिन में बनकर हुई तैयार, 20 हजार आया खर्च
व्हीलचेयर को बनाने में छात्रों को 60 दिन से कम समय लगा। इसकी लागत 20 हजार रुपये आई है। डॉ.राहुल उमराव के अलावा असिस्टेंट प्रोफेसर अंकिता तिवारी ने भी इसमें छात्रों की मदद की।
प्रशस्ति पत्र, मेडल व ट्राफी से हुए सम्मानित
यूपीसीएसटी की ओर से आयोजित प्रतियोगिता में इस शानदार मॉडल को प्रदर्शित करने के लिए निदेशक ए.दिनेश कुमार ने छात्रों व प्रोफेसरों की टीम को प्रशस्ति पत्र, मेडल व ट्राफी देकर सम्मानित किया। छात्रों की इस उपलब्धि पर कॉलेज के निदेशक जीजी शास्त्री, कीर्ति मल्होत्रा, संयुक्त सचिव जावेद हाशमी ने भी खुशी जताते हुए छात्रों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।

Monday, May 13, 2019

बेरोजगार दिव्यांगों को स्वरोजगार की ‘बैसाखी'



यदि आप दिव्यांग हैं और अपना रोजगार करना चाहते हैं तो आपके लिए अच्छी खबर है। दिव्यांगजन विकास विभाग न केवल आपकी सहायता करेगा बल्कि एनएचएफडीसी (नेशनल हैंडीकैप फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) आपकी आर्थिक मदद भी करेगा। योजना को अमलीजामा पहनाने की जिम्मेदारी जिला दिव्यांगजन सशक्तीकरण अधिकारी और नोडल बैंक को दी गई है। मदद की रकम 10 हजार से बढ़ाकर पांच लाख करने की कवायद भी शुरू हो गई है।
दिव्यांगजन विकास विभाग और एनएचएफडीसी की ओर से उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण के साथ ही स्वरोजगार में सहायता दी जाएगी। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से प्रदेश के सभी जिलों सहकारी बैंकों के माध्यम 40 फीसद से अधिक विकलांगता होने पर आर्थिक मदद का प्रावधान किया गया है। 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले दिव्यांग जिला दिव्यांगजन विकास अधिकारी कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।
 जिला दिव्यांगजन सशक्तीकरण अधिकारी डॉ.अमित कुमार राय ने बताया कि कार्यालय में पंजीकृत दिव्यांगों को बैंक के माध्यम से आर्थिक मदद दिलाई जाती है। किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए दिव्यांग कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं। आर्थिक मदद को 10 हजार से बढ़ाकर पांच लाख करने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है।
इसके लिए मिलेगी सहायता
दिव्यांगों को आर्थिक सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया जाएगा। कागज के प्लेट बनाना, साबुन बनाना, तेल मिल व फर्नीचर का निर्माण के अलावा सेवा क्षेत्र में दूध का बूथ, कंप्यूटर, फोटोकॉपी, टाइ¨पग सेंटर, जनरल स्टोर, मेडिकल, स्टेशनरी व रेडीमेट गारमेंट की दुकान खोलने के साथ ही ट्रैक्टर, डेयरी, मुर्गी फार्म व पशुचारे के लिए भी आर्थिक मदद दी जाएगी। पंजाब नेशनल बैंक, आंध्रा बैंक, आइडीबीआइ के अलावा जिला की सहकारी बैंक के माध्यम से दिव्यांगों को आर्थिक मदद की जाएगी। दिव्यांगों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए संघर्ष कर रहे सूरज यादव का कहना है कि बैंक दिव्यांगों की मदद करने में पीछे रहते हैं। ऐसे दिव्यांगों के लिए मंच संघर्ष करता है।

Saturday, April 27, 2019

जीना इसी का नाम है:बिन हाथों के भरी उड़ान



जेसिका का जन्म अमेरिका के अरिजोना प्रांत के एक गांव में हुआ था। जन्म के बाद जब नर्स ने देखा, तो अवाक रह गई। इस बच्ची के दोनों हाथ नहीं थे। समझ में नहीं आया कि उनकी मां को क्या बताएं? कैसे कहें कि आपने एक दिव्यांग बेटी को जन्म दिया है?
मम्मी और पापा ने जब पहली बार अपनी बच्ची को देखा, तो उन्हें सदमा लगा, लेकिन उन्होंने तय कर लिया कि वे अपनी बेटी को कभी हीन भावना का शिकार नहीं होने देंगे। वे कभी नहीं चाहते थे कि लोग उनकी बेटी पर दया करें। बड़े प्यार से उनकी परवरिश की गई। मां उनका खास ख्याल रखती थीं। हाथ न होने की वजह से बेटी को तकलीफ न हो, इसलिए उनके कृत्रिम हाथ लगवाए गए, लेकिन जेसिका उन हाथों के साथ सहज नहीं थीं। वह धीरे-धीरे अपने सारे काम पांव से करने लगीं। फिर चाहे वह किताब उठाना हो या घर का कोई अन्य काम।
जेसिका कहती हैं, जन्म से ही हाथ नहीं थे, इसलिए मैंने इनके बिना जीना सीख लिया। प्रकृति आपको सब कुछ सिखा देती है। जब स्कूल जाना शुरू किया, तो बड़ी मुश्किल आई। क्लास में पढ़ने वाले बच्चे उन्हें अजीब नजरों से देखते थे। पर मम्मी-पापा ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। इस दौरान उन्होंने अपने पैरों से बालों में कंघी करना और नहाना आदि सीख लिया। 14 साल की हुईं, तो उन्होंने कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करना पूरी तरह बंद कर दिया। वह हर काम पैरों से करने लगीं। जेसिका कहती हैं, लोग मुझे अजीब नजरों से घूरते थे, लेकिन मैंने कभी अपने अंदर हीन भावना नहीं आने दी।
स्कूल के दिनों से वह डांस में हिस्सा लेने लगीं। यही नहीं, पैरों के सहारे वह कराटे चैंपियन बनीं। उन्होंने घुड़सवारी और स्कूबा डाइविंग भी सीखी। दुनिया इस दिव्यांग लड़की का जज्बा देखकर दंग थी। उन्होंने मनोविज्ञान में स्नातक डिग्री हासिल की। जेसिका कहती हैं, मैंने कभी यह नहीं कहा कि यह काम मैं नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे हाथ नहीं हैं। मुझे हमेशा लगता था कि मैं सब कुछ कर सकती हूं। मैं दुनिया में किसी से कम नहीं हूं।
समय के साथ जेसिका के अंदर सब कुछ सीखने का जूनून बढ़ता गया। वह हर वो काम करना चाहती थीं, जो दो हाथ वाले इंसान करते हैं। वह पैरों से कार चलाने लगीं। उन्होंने पैरों से टाइपिंग सीखी। यह सिर्फ सीखने भर के लिए नहीं था। जब वह पैरों की उंगलियों से टाइपिंग करती थीं, तो लोगों को यकीन नहीं होता था। उनकी टाइपिंग स्पीड प्रति मिनट 25 शब्द है। उन्होंने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए। 
जेसिका अब 25 साल की हो चुकी थीं। एक दिन उन्होंने सोचा कि ऐसा कौन-सा काम है, जो मैं नहीं कर सकती और दो हाथ वाले इंसान कर सकते हैं। तब मन में आया कि वह हवाई जहाज नहीं उड़ा सकतीं। बिना हाथ के हवा में सैर करना खतरे से खाली नहीं था, लेकिन मन में ख्वाहिश थी कि एक दिन पैरों से हवाई जहाज उड़ाते हुए आसमान में सैर की जाए। तब उन्हें लगता था कि यह असंभव है।  
इस बीच फाइटर प्लेन के एक पायलट से उनकी मुलाकात हुई। वह जन-कल्याण के लिए काम करते थे। उन्होंने जेसिका से पूछा, क्या तुम यह प्लेन उड़ाना चाहोगी? पायलट ने उनसे दोबारा कहा, एक बार कोशिश करके देखो। इस बार जेसिका को यह बात जम गई। उन्होंने तय कर लिया जहाज उड़ाऊंगी।
जेसिका कहती हैं, मुझे उड़ने से डर लगता था। मैं इस डर पर काबू पाना चाहती थी। मैं आंखें बंद करके कल्पना करने लगी कि मैं एक सुपरवुमेन हूं और हवा में उड़ रही हूं। इस कल्पना ने मेरे मन से सारा डर बाहर निकाल दिया।
पायलट बनने को उन्होंने एक चुनौती के रूप में लिया। उन्हें एक ऐसे जहाज में ट्रेनिंग दी गई, जिसे कंट्रोल करने के लिए केवल दो हाथों की जरूरत थी, पैरों की नहीं। चूंकि उनके हाथ नहीं थे, इसलिए वह पैरों से विमान का नियंत्रण संभालने लगीं। तीन ट्रेनर की निगरानी में उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई। उन्होंने पैरों से विमान उड़ाना सीखा। इस काम में उन्हें करीब तीन साल लगे। इस दौरान उन्होंने 89 घंटे उड़ान का अभ्यास किया। इसके बाद उन्हें लाइट वेट विमान उड़ाने का लाइसेंस मिल गया।
जेसिका दुनिया की पहली बिना हाथ वाली महिला हैं, जिन्हें हवाई जहाज उड़ाने का लाइसेंस मिला है। इस वजह से उनका नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉड्र्स में दर्ज किया गया है। जेसिका कहती हैं, जब मेरी ट्रेनिंग शुरू हुई, तो कुछ लोगों ने कहा कि मैं बेवजह खतरा मोल ले रही हूं। इससे मुझे नुकसान हो सकता है। पर ऐसे भी लोग थे, जो लगातार मेरा हौसला बढ़ा रहे थे।
कामयाबी और शोहरत पाने के बाद वह घर बसाना चाहती थीं। उनकी यह ख्वाहिश भी पूरी हुई। उनके दोस्त पैट्रिक चैंबरलेन ने 2012 में उनसे शादी करने का फैसला किया। अब मुश्किल यह थी कि वह सगाई की अंगूठी कैसे पहनेंगी? उनके तो हाथ ही नहीं थे। तब मंगेतर पैट्रिक ने कहा कि वह जेसिका के पांव की उंगली में अंगूठी पहनाएंगे। जाहिर है, उनकी सगाई की तस्वीरें बहुत वायरल हुई थीं।